वेतनधारी नोकरदार

  • मध्‍यमवर्गीय वर्गने सदाके लिये माना है की कारोबार करना एक और तनावपूर्ण प्रस्‍ताव है| उनकी ये धारणा बनी होती है की कारोबारकी यशस्‍वीताकेलिए चालाकी और तिकडमबाजी आवश्‍यक है| ये लागोंने वेतन मिलनेवाला काम इसलिए चुना है की ये एक सुरक्षित तथा स्थिर व्‍यवसायक्षेत्र है| इसके अलावा दूसरी आकृष्‍ट करनेवाली चीजे है- एक प्रामाणिक तनाव-मुक्‍त और आपत्ती-विरहित जीवन जीनेकी सुविधा|
  • वेतनधारीयोंका जीवन एक ‘नौ से पॉंच’ कहलाता था और वे सब प्रकारकी हप्‍तेकी तथा सरकारी छुट्टीयोंके लाभ उठा सकते थे| इसका मतलब था, नौकरी देनेवाले संघटनोंके तय किये हुये करीयरके रास्‍तेपर चलना और एक अच्‍छा निवृत्ती योजनाके हकदार होना की जो नियोजनपूर्व बचतसे या अपने आप शासकीय कर्मचारीयोंके लिये प्राप्‍त था|
  • दुर्भाग्‍यसे सरकारने एकके बाद एक कर लगाना शुरु कर दिया| अच्‍छे वेतनधारी ये कर भरते रहे और एक दिन वेतनधारीयोंको महसूस होने लगा की वे अकेलेही नियमके अनुसार कर दे रहे है| बाकी सब वर्गके लोग पूरे या अंशतः करोंसे छुटकारा पा रहे है| इस तरह नोकरदारवर्ग उनके ‘संरक्षित’ नोकरयोंमे फँस गये|
  • हर बरस, बजेट आनेके समय नोकरदारवर्ग सरकारने नये करोंके घोषणाके डरसे सुकड जाता है| वे जानते है की कही छीप नही सकते| इस तरह सबकर आखिर नोकरदारोंके की जो सफेद अर्थव्‍यवस्‍थामे रहते है उनकोही प्रभावित होते है|
  • जागतिकीकरण आनेसे पारंपारिक कल्‍पनाए ‘जॉब सिक्‍युरिटी’ और ‘खतरेसे मुक्‍त जीवन’ सदाके लिए खत्‍म हो गयी है| आजके इस दौरमे कंपनीयोंको एकत्रीकरण, खरीदना, बंद करना और निवेशकी वापसीके कोई नोकरी संरक्षित नही है| वेतनपर नोकरी करना आज एक कारोबार चलाने जैसा तनावपूर्ण और खतरेका है|
  • प्रगत तकनिक (ऑटोमेशन) और कौशल्‍यकी अनावश्‍यकतासे नौकरीयोंके अवसर कम होते जा रहे है| इससे कामकी जगहोंपर और बाहर कडी स्‍पर्धाओंका सामना हो रहा है| ‘नौ से पॉंच’ वाली नौकरीयॉं अब बीती हुयी बात बन चुकी है| नियमित हप्‍तेकी छुट्टीयॉ एक इतिहास हो गयी है|
  • क्‍या वेतनपर काम करनेवालोंको इस धीरेसे कसते.